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नीचे कक्षा 9 भूगोल अध्याय 2 – पृथ्वी की सतह का निर्माण (हिंदी माध्यम) के संपूर्ण एवं विस्तृत नोट्स दिए गए हैं। ये नोट्स नवीनतम CBSE पाठ्यक्रम के अनुसार सरल और स्पष्ट भाषा में तैयार किए गए हैं, ताकि विद्यार्थी प्रत्येक विषय को आसानी से समझ सकें तथा परीक्षा की प्रभावी तैयारी कर सकें।

Prithvi ki satah ka nirmaan || Chapter-2 || class-9(geogrophy-Bhugol)

पृथ्वी की सतह का निर्माण

 परिचय

  • पृथ्वी की सतह निरंतर बदलती रहती है। यह परिवर्तन पृथ्वी के आंतरिक भाग तथा इसकी सतह पर कार्य करने वाली शक्तिशाली प्राकृतिक शक्तियों के कारण होता है।
  • इन परिवर्तनों को समझाने वाला सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत प्लेट विवर्तनिकी (Plate Tectonics) का सिद्धांत है।
  • इस सिद्धांत के अनुसार पृथ्वी की भूपर्पटी (Crust) के बड़े-बड़े खंड पिघले हुए मैंटल (Mantle) के ऊपर बहुत धीमी गति से निरंतर गतिमान रहते हैं।

स्थलरूप क्या हैं?

स्थलरूप (Landforms) पृथ्वी की सतह पर पाए जाने वाले प्राकृतिक भू-आकृतिक स्वरूप हैं, जिनका निर्माण अपक्षय , अपरदन , निक्षेपण  तथा पृथ्वी की भूपर्पटी (Crust) की गति जैसी प्राकृतिक प्रक्रियाओं के परिणामस्वरूप होता है।

स्थलरूपों की उत्पत्ति

विवर्तनिक प्लेटों (Tectonic Plates) की गति के परिणामस्वरूप विभिन्न प्रकार के स्थलरूपों का निर्माण होता है, जैसे पर्वत, ज्वालामुखी, मैदान तथा घाटियाँ।

प्लेट विवर्तनिकी एवं स्थलरूपों को समझना

यह सिद्धांत हमें भूकंप, ज्वालामुखी विस्फोट तथा महाद्वीपों और महासागरों के निर्माण जैसी प्राकृतिक घटनाओं को समझने में सहायता करता है।

प्लेट विवर्तनिकी

प्लेट विवर्तनिकी ) एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है, जिसे डब्ल्यू. जे. मॉर्गन (W. J. Morgan) ने प्रस्तुत किया था। यह सिद्धांत पृथ्वी की भूपर्पटी की गति तथा उसके निरंतर होने वाले संचलन की व्याख्या करता है।

 प्लेट विवर्तनिकी क्या है?

  • इस सिद्धांत के अनुसार, पृथ्वी की सबसे बाहरी परत (भूपर्पटी) एक ही ठोस भाग नहीं है, बल्कि यह कई बड़ी और छोटी विवर्तनिक प्लेटों  में विभाजित है।
  • ये प्लेटें अपने नीचे स्थित अर्ध-पिघली हुई परत (Semi-molten Layer) पर बहुत धीमी गति से निरंतर संचालित होती रहती हैं।
  • इन प्लेटों की गति के कारण ही पर्वतों, भूकंपों, ज्वालामुखियों तथा अन्य प्रमुख स्थलरूपों और प्राकृतिक घटनाओं का निर्माण होता है।

पृथ्वी का आंतरिक भाग

 

पृथ्वी तीन प्रमुख परतों से बनी हुई है: भूपर्पटी (Crust), मैंटल (Mantle) और क्रोड (Core)।

  1. भूपर्पटी
  • भूपर्पटी पृथ्वी की सबसे बाहरी और ठोस परत है, जिस पर हम रहते हैं।

  • इसकी मोटाई महाद्वीपों के नीचे लगभग 30–40 किमी (महाद्वीपीय भूपर्पटी – लगभग 30 किमी) तथा महासागरों के नीचे लगभग 5–7 किमी (महासागरीय भूपर्पटी – लगभग 5 किमी) होती है।

2. मैंटल

  • भूपर्पटी (Crust) के नीचे मैंटल (Mantle) स्थित होता है, जो पृथ्वी की सबसे मोटी तथा अत्यधिक गर्म परत है।

  • यह भूपर्पटी (Crust) और बाह्य क्रोड (Outer Core) के बीच स्थित मुख्यतः ठोस (Mostly Solid) परत है।

  • मैंटल की अनुमानित मोटाई लगभग 2,900 किलोमीटर होती है।

3. क्रोड

  • क्रोड (Core) पृथ्वी की सबसे भीतरी परत है, जो अत्यधिक गर्म तथा घनी (Heavy) होती है।

(i) बाह्य क्रोड (Outer Core)

  • बाह्य क्रोड (Outer Core) एक द्रव (तरल) परत है, जो मुख्यतः लौह  और निकेल  से मिलकर बनी होती है।

  • इसकी अनुमानित मोटाई लगभग 2,200 किलोमीटर होती है।

(ii) आंतरिक क्रोड (Inner Core)

  • आंतरिक क्रोड (Inner Core) ठोस धातुओं का अत्यधिक गर्म और घूर्णनशील (Spinning) गोला है, जो पृथ्वी का सबसे अधिक घनत्व वाला भाग है।

  • इसकी अनुमानित मोटाई लगभग 1,250 किलोमीटर होती है।

  • पृथ्वी की सतह से उसके केंद्र तक की कुल गहराई लगभग 6,375 किलोमीटर है।

 स्थलमंडल एवं दुर्बलतामंडल 

स्थलमंडल

  • स्थलमंडल (Lithosphere) पृथ्वी की कठोर एवं ठोस बाहरी परत है, जिसमें भूपर्पटी (Crust) तथा ऊपरी मैंटल (Upper Mantle) शामिल होते हैं।

  • यह परत कई विवर्तनिक प्लेटों (Tectonic Plates) में विभाजित होती है।

  • स्थलमंडल की अनुमानित मोटाई लगभग 100 किलोमीटर होती है।

दुर्बलतामंडल (अनुमानित मोटाई: लगभग 200 किलोमीटर)

  • दुर्बलतामंडल स्थलमंडल के ठीक नीचे स्थित होता है।

  • यह आंशिक रूप से पिघली हुई चट्टानों की अत्यधिक गर्म तथा गतिशील परत है।

  • यह परत अर्ध-पिघली  होती है, जिसके कारण विवर्तनिक प्लेटें इसके ऊपर धीरे-धीरे गति कर पाती हैं।

विवर्तनिक प्लेटों के गुण

विवर्तनिक प्लेटें ठोस चट्टानों के विशाल खंड हैं, जो बहुत धीमी गति से संचालित होती हैं। ये सामान्यतः प्रति वर्ष कुछ सेंटीमीटर की गति से चलती हैं।

विवर्तनिक प्लेटों के तीन मुख्य प्रकार

  • महाद्वीपीय प्लेटें: ये वे विवर्तनिक प्लेटें हैं, जिन पर महाद्वीप स्थित होते हैं अथवा जो महाद्वीपों को धारण करती हैं।

  • महासागरीय प्लेटें: ये वे विवर्तनिक प्लेटें हैं, जो महासागरों के तल  को धारण करती हैं।

  • मिश्रित प्लेटें: ये वे विवर्तनिक प्लेटें हैं, जिन पर महाद्वीप तथा महासागर—दोनों स्थित होते हैं।

विश्व की प्रमुख विवर्तनिक प्लेटें

प्रशांत प्लेट, यूरेशियन प्लेट, अफ्रीकी प्लेट, उत्तरी अमेरिकी प्लेट, दक्षिणी अमेरिकी प्लेट, हिंद-ऑस्ट्रेलियाई प्लेट, अंटार्कटिक प्लेट 

विवर्तनिक प्लेटों का संचलन

  • मैंटल में उत्पन्न होने वाली संवहन धाराओं के कारण विवर्तनिक प्लेटों का संचलन होता है।
  • पृथ्वी के केंद्रक से प्राप्त ऊष्मा के कारण मैंटल में उपस्थित पिघला हुआ पदार्थ ऊपर उठता है, जबकि अपेक्षाकृत ठंडा पदार्थ नीचे की ओर धँस जाता है।

संवहन धाराएँ

यह निरंतर गति संवहन धाराओं का निर्माण करती है, जो विवर्तनिक प्लेटों को धक्का देती हैं और खींचती हैं, जिससे वे विभिन्न दिशाओं में संचालित होती हैं।

प्लेट सीमाएँ

जहाँ विवर्तनिक प्लेटें एक-दूसरे से मिलती हैं, उन किनारों को प्लेट सीमाएँ कहा जाता है। इनके तीन मुख्य प्रकार हैं।

1. अभिसारी प्लेट सीमा

  • जहाँ दो प्लेटें एक-दूसरे की ओर गति करती हैं।
  • महाद्वीपीय–महाद्वीपीय टक्कर: जब दो महाद्वीपीय प्लेटें आपस में टकराती हैं, तो उनके परिणामस्वरूप हिमालय जैसे वलित पर्वत बनते हैं।
  • महासागरीय–महाद्वीपीय टक्कर: जब कोई महासागरीय प्लेट किसी महाद्वीपीय प्लेट से टकराती है, तो महासागरीय प्लेट महाद्वीपीय प्लेट के नीचे धँस जाती है, जिससे ज्वालामुखीय गतिविधियाँ और भूकंप उत्पन्न होते हैं।

2. अपसारी प्लेट सीमा

  • जहाँ प्लेटें एक-दूसरे से दूर की ओर गति करती हैं।
  • निर्माण: इस स्थिति में मैग्मा नीचे से ऊपर उठकर नई भूपर्पटी का निर्माण करता है, जिससे मध्य-महासागरीय पर्वत-श्रृंखलाओं जैसी स्थलाकृतियाँ बनती हैं।
  • उदाहरण: मध्य-अटलांटिक पर्वत-श्रृंखला इसका एक प्रमुख उदाहरण है।

3. रूपांतरण प्लेट सीमा

  • जहाँ प्लेटें भूपर्पटी का न तो निर्माण करती हैं और न ही उसका विनाश करती हैं, बल्कि एक-दूसरे के समानांतर फिसलती हुई आगे बढ़ती हैं।
  • प्रभाव: इस प्रकार की प्लेटों की गति मुख्य रूप से भूकंप उत्पन्न करती है।
  • उदाहरण: संयुक्त राज्य अमेरिका में स्थित सैन एंड्रियास भ्रंश इसके प्रमुख उदाहरणों में से एक है।
 
 
 

प्लेट विवर्तनिकी की प्रमुख भूमिका

  • पृथ्वी की सतह के निर्माण एवं उसके स्वरूप को निर्धारित करने में इसकी प्रमुख भूमिका होती है।
  • इसके परिणामस्वरूप पर्वतों, घाटियों, महासागरीय बेसिनों, ज्वालामुखियों तथा भूकंपों का निर्माण होता है।
  • यह पृथ्वी पर महाद्वीपों और महासागरों के वितरण की व्याख्या करती है।
  • प्रशांत महासागरीय अग्नि वलय (Ring of Fire): अधिकांश भूकंप और ज्वालामुखी प्लेट सीमाओं के किनारे पाए जाते हैं, विशेषकर प्रशांत महासागर के चारों ओर स्थित उस क्षेत्र में, जिसे प्रशांत महासागरीय अग्नि वलय कहा जाता है।

अपक्षय एवं अपरदन की प्रक्रिया

अपक्षय और अपरदन पृथ्वी की सतह को निरंतर तोड़ने तथा उसका पुनः स्वरूप निर्माण करने के माध्यम से स्थलाकृतियों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

अपक्षय

अपक्षय वह प्रक्रिया है, जिसके द्वारा पृथ्वी की सतह पर स्थित चट्टानें विभिन्न प्रक्रियाओं के कारण टूटकर छोटे-छोटे टुकड़ों में विभाजित हो जाती हैं।

अपक्षय के तीन प्रमुख प्रकार

1. भौतिक अपक्षय

चट्टानें तापमान में परिवर्तन, पाले (हिम) अथवा पवन के प्रभाव से टूटकर छोटे-छोटे टुकड़ों में विभाजित हो जाती हैं।

2. रासायनिक अपक्षय

चट्टानों में उपस्थित खनिज जल, वायु अथवा अम्लों के साथ होने वाली रासायनिक अभिक्रियाओं के कारण परिवर्तित होकर नए पदार्थों का निर्माण करते हैं।

3. जैविक अपक्षय

यह पौधों, जीव-जंतुओं अथवा सूक्ष्मजीवों द्वारा उत्पन्न होता है। उदाहरण के लिए, जब पौधों की जड़ें चट्टानों की दरारों में प्रवेश करके बढ़ती हैं, तो वे चट्टानों को फाड़कर अलग कर देती हैं।

अपरदन

अपरदन वह प्रक्रिया है, जिसके द्वारा मृदा, चट्टानें तथा पृथ्वी की सतह पर स्थित अन्य पदार्थ जल, पवन, हिमनद अथवा समुद्री लहरों जैसे प्राकृतिक कारकों द्वारा घिसकर एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाए जाते हैं।

अपरदन के प्रकार

  • जल अपरदन: नदियों, वर्षा अथवा समुद्री लहरों द्वारा होने वाला अपरदन।
  • पवन अपरदन: शुष्क एवं रेतीले क्षेत्रों में होने वाला अपरदन।
  • हिमनदीय अपरदन: गतिशील हिमनदों द्वारा चट्टानों को घिसकर तथा उन्हें अपने साथ ले जाने से होने वाला अपरदन।
  • तटीय अपरदन: समुद्री लहरों द्वारा तट के किनारे स्थित भूमि के कटाव से होने वाला अपरदन।

अपरदन के मानवीय एवं आर्थिक प्रभाव

  • व्यवसायों पर प्रभाव: अपरदन भूमि और मृदा में परिवर्तन करके उन अनेक व्यवसायों को प्रभावित करता है, जिन पर लोग अपनी आजीविका के लिए निर्भर रहते हैं।
  • किसानों पर प्रभाव: अपरदन फसलों की वृद्धि के लिए आवश्यक उपजाऊ ऊपरी मृदा (Topsoil) को हटा देता है, जिससे फसल उत्पादन में कमी आती है।
  • नदियों एवं तटीय क्षेत्रों पर प्रभाव: नदियों और तटीय क्षेत्रों के निकट रहने वाले लोगों के लिए अपरदन भूमि, मकानों तथा सड़कों को बहा ले जाता है, जिससे संपत्ति की हानि और व्यापक नुकसान होता है।
  • उद्योगों पर प्रभाव: पर्यटन और मत्स्य पालन जैसे उद्योग भी प्रभावित होते हैं, क्योंकि अपरदन के कारण समुद्र तट, नदियाँ तथा उपजाऊ भूमि नष्ट हो सकती हैं।
  • निर्माण एवं खनन पर प्रभाव: अपरदन भूमि को अस्थिर बना देता है, जिससे निर्माण कार्यों और खनन गतिविधियों में सुरक्षा संबंधी जोखिम उत्पन्न हो जाते हैं।

प्राचीन मृदा एवं जल प्रबंधन

सिंधु-सरस्वती सभ्यता: इस सभ्यता में जल प्रबंधन के लिए समोच्च जुताई, मेड़बंदी, सीढ़ीनुमा खेती), बाँध तथा नहरों जैसी उन्नत तकनीकों का उपयोग किया जाता था।

संस्कृत ग्रंथ: अनेक संस्कृत ग्रंथों में इन प्रथाओं का उल्लेख मिलता है, जिनमें वेद, कृषिपाराशर तथा कौटिल्य का अर्थशास्त्र प्रमुख हैं।

नागालैंड की ज़ाबो प्रणाली मृदा एवं जल संरक्षण के लिए पहाड़ी ढालों पर मिट्टी की मेड़ें बनाकर अपनाई जाने वाली एक एकीकृत कृषि प्रणाली का उत्कृष्ट उदाहरण है।

समतलीकरण के कारक

समतलीकरण के कारक वे प्राकृतिक शक्तियाँ हैं, जो पृथ्वी की सतह पर स्थित पदार्थों का अपरदन, परिवहन तथा निक्षेपण करती हैं, जिससे समय के साथ पृथ्वी की सतह समतल अथवा अधिक समरूप होती जाती है।

समतलीकरण के पाँच प्रमुख कारक

  • बहता हुआ जल: चट्टानों और मृदा का अपरदन करके घाटियों तथा मैदानों का निर्माण करता है।
  • हिमनद: विशाल मात्रा में पदार्थों को घिसकर अपने साथ ले जाते हैं तथा यू-आकार की घाटियों का निर्माण करते हैं।
  • पवन: रेत का अपरदन और निक्षेपण करके मरुस्थलीय स्थलाकृतियों का निर्माण करती है।
  • समुद्री लहरें: तटों का अपरदन करके समुद्री कगार, समुद्र तट तथा खाड़ियों का निर्माण करती हैं।
  • भूमिगत जल: चूना-पत्थर जैसी चट्टानों को घोलकर गुफाओं तथा विलय गर्तों का निर्माण करता है।

➔ ये सभी कारक मिलकर निरंतर स्थलाकृतियों में परिवर्तन कर रहे हैं, ऊँचे क्षेत्रों को नीचा कर रहे हैं तथा निम्न क्षेत्रों को भर रहे हैं।

बहता हुआ जल

नदियाँ अपरदन, परिवहन तथा निक्षेपण की प्रक्रियाओं के माध्यम से भूमि के स्वरूप को आकार देती हैं और अपने मार्ग के along विभिन्न प्रकार की स्थलाकृतियों का निर्माण करती हैं।

तीन प्रवाह मार्ग

1. ऊपरी प्रवाह

नदियाँ तीव्र ढाल और प्रबल अपरदनकारी शक्तियों के कारण प्रायः V-आकार की घाटियों, जलप्रपातों तथा तीव्र धाराओं का निर्माण करती हैं।

2. मध्य प्रवाह

जैसे-जैसे नदी अपनी ऊर्जा खोने लगती है और तलछटों का निक्षेपण करना शुरू करती है, वह घुमावदार मार्ग (Meanders) बनाने लगती है, जिससे घोड़े की नाल के आकार की झीलें और बाढ़ के मैदान का निर्माण होता है।

3. निचला प्रवाह

नदी की गति और अधिक धीमी हो जाती है तथा यह बड़ी मात्रा में तलछट का निक्षेपण करती है, जिससे डेल्टा, तटबंध तथा जलोढ़ पंखे का निर्माण होता है।

जलप्रपात

जलप्रपात एक स्थलाकृति है, जहाँ नदी किसी खड़ी चट्टान या ऊर्ध्वाधर ढाल से होकर नीचे गिरती है, जिससे एक आकर्षक जल गिरावट का निर्माण होता है।

निर्माण: जलप्रपात नदियों के ऊपरी प्रवाह में बनते हैं, जहाँ कठोर चट्टानें अपरदन का प्रतिरोध करती हैं, जबकि उनके नीचे स्थित नरम चट्टानें अपरदित होकर हट जाती हैं, जिससे अचानक ऊँचाई में गिरावट (ढाल) का निर्माण होता है।

आर्थिक एवं सामाजिक महत्व

  • जलप्रपात पर्यटकों को आकर्षित करते हैं, जिससे वे स्थानीय पर्यटन और अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण बन जाते हैं।
  • जलप्रपातों का उपयोग कभी-कभी जलविद्युत ऊर्जा के उत्पादन के लिए किया जाता है।
  • वे मनोरंजन के अवसर प्रदान करते हैं, जैसे ट्रेकिंग और फोटोग्राफी, तथा इनका सांस्कृतिक या धार्मिक महत्व भी होता है।

नदी विसर्प

नदी विसर्प नदी के मध्य या निचले प्रवाह में बनने वाला एक घुमावदार मोड़ या वक्र होता है, जिसका निर्माण पार्श्व अपरदन और तलछटों के निक्षेपण के कारण होता है।

निर्माण: जैसे-जैसे नदी बहती है, यह मोड़ों के बाहरी किनारों का अपरदन करती है और आंतरिक किनारों पर तलछट का निक्षेपण करती है, जिससे धीरे-धीरे बड़े-बड़े घुमावदार मोड़ (लूप) बन जाते हैं।

नदी विसर्पों का महत्व

  • नदी विसर्प मानव जीवन के लिए महत्वपूर्ण होते हैं क्योंकि इनके किनारों पर जमा होने वाली उपजाऊ मिट्टी कृषि को सहारा प्रदान करती है।
  • ये मानव बस्तियों के स्वरूप को प्रभावित करते हैं।
  • नदी विसर्पों वाली नदियों का उपयोग नौवहन और सिंचाई के लिए किया जा सकता है। उदाहरण- तमिलनाडु में स्थित ग्रैंड एनीकट, जिसे कल्लनई के नाम से भी जाना जाता है।

डेल्टा

डेल्टा एक स्थलाकृति है, जिसका निर्माण नदी के मुहाने पर होता है, जहाँ नदी समुद्र, महासागर या झील में प्रवेश करती है और अपने द्वारा ऊपरी क्षेत्रों से लाए गए तलछटों का निक्षेपण करती है।

निर्माण: समय के साथ ये निक्षेपित पदार्थ एकत्रित होकर पंखे के आकार या त्रिकोणीय आकार के भू-भाग का निर्माण करते हैं।

डेल्टा का महत्व

  • अपनी समृद्ध जलोढ़ मिट्टी के कारण डेल्टा क्षेत्र अत्यधिक उपजाऊ होते हैं, जो इन्हें कृषि के लिए उपयुक्त बनाते हैं और चावल तथा जूट जैसी फसलों के उत्पादन में सहायक होते हैं।
  • डेल्टा क्षेत्र मत्स्य पालन के लिए महत्वपूर्ण होते हैं, क्योंकि यहाँ मीठे और खारे पानी के मिश्रण से विभिन्न प्रकार के जलीय जीवों का विकास होता है।
  • डेल्टा क्षेत्र घनी मानव बस्तियों को सहारा देते हैं और व्यापार तथा परिवहन के प्रमुख केंद्र होते हैं।

डेल्टा के प्रभाव

डेल्टा क्षेत्र बाढ़ की संभावना से भी प्रभावित हो सकते हैं, जिससे मानव जीवन और गतिविधियों पर प्रभाव पड़ता है।

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